अगोरा प्रकाशन केवल किताबों का मुद्रक नहीं है, बल्कि यह उन असहमतियों का संग्रह है जिन्हें मुख्यधारा के विमर्श ने हाशिए पर धकेल दिया है। हमारा फलसफा शब्दों की स्याही से सामाजिक परिवर्तन की इबारत लिखना है।
१. सामाजिक न्याय
अगोरा का जन्म ही इस विचार के साथ हुआ है कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की लड़ाई का एक मोर्चा है। हम उन आवाजों को पन्ने मुहैया कराते हैं जो जातिवाद, सांप्रदायिकता और वर्ग-भेद की दीवारों को ढहाने का माद्दा रखती हैं।
२. बगावती स्वर
हमारा समाज सदियों से स्त्री-द्वेषी और पितृसत्तात्मक ढांचों में जकड़ा रहा है। अगोरा इन बेड़ियों को तोड़ने वाले 'बगावती स्वरों' का मंच है। हम उन लेखिकाओं को प्राथमिकता देते हैं जो घरेलू हिंसा, पितृसत्ता और यौनिकता के संघर्ष को बिना झिझक स्वर देती हैं।
३. पर्यावरण-लोकतंत्र
आज के दौर में सबसे बड़ा संकट प्रकृति पर कब्जा करने की पूंजीवादी होड़ है। अगोरा पर्यावरण-लोकतंत्र का हिमायती है। हम ऐसी किताबों को प्रकाशित करते हैं जो विकास के विनाशकारी मॉडल पर सवाल उठाती हैं।
अगोरा से ही किताब क्यों छपवाएं?
• वैचारिक स्पष्टता: यदि आपका लेखन सत्ता, समाज या रूढ़ियों से टकराता है, तो अगोरा आपका नैसर्गिक घर है।
• समावेशी मंच: हम स्थापित नामों के बजाय उन नए कलमकारों को खोजते हैं जिनके पास कहने के लिए कुछ मौलिक है।
• गुणवत्ता और सरोकार: हमारी किताबों का संपादन केवल व्यावसायिक नहीं होता, बल्कि उसमें विषय की गंभीरता झलकती है।
• साझा संघर्ष: हम लेखक को केवल एक वेंडर नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का साथी मानते हैं।
"किताबें सिर्फ शेल्फ की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि सोए हुए जमीर को जगाने और यथास्थिति को चुनौती देने के लिए होनी चाहिए।"